गन्दा है पर धंधा है ये…
Aug 16th
पैसा…एक बिमारी कह लो या ज़रूरत…एक नशा कह लो या आदत…तुम चाह कर भी उस से मुह फेर नहीं सकते…और पा कर भी उसे हासिल कर नही सकते…क्यों की कमाते भी है तो उसे खर्च करने के लिए !
और लोग क्या क्या नहीं करते उसके लिए…हर रोज़ कोई ना कोई नया करीना जान ने को मिलता हैं…और ये ही सब दिमाग में चल रहा था तब कुछ दिनों पहले ‘फेसबुक’ पे स्टेटस अपडेट किया…’सब गन्दा है पर धंधा है ये’…तो एक बहोत करीबी दोस्त हेमंत ने कहा की क्यों ना इसी लाइन को ले कर एक नया गाना लिखा जाए ? उसकी बात ने दिमाग के सोए हुए ‘कीडे’ को जगा दिया…और इस लाइन को ले कर एक अलग नज़रिए से नया गाना लिख दिया…
पैसे का ही सारा पंगा है ये
कहीं लूंट तो कहीं दंगा है ये
बुरा ना मानो यारों क्यों की,
सब गन्दा है पर धंधा है ये…
कोई थाली बेच के खता है
कोई पानी से भी कमाता है
कहीं भगवान के नाम चंदा है ये
सब गन्दा है पर धंधा है ये…
कोई कपडों का व्यापारी है
कहीं जिस्मों की सौदेबाज़ी है
बस दौलत की बहती गंगा है ये
सब गन्दा है पर धंधा है ये…
उलझे हैं सभी इस मायाजाल में
चाहिए पैसा, किसी भी हाल में
चाहे कैसा भी हो, ‘चंगा’ है ये
सब गन्दा है पर धंधा है ये…
( हेमंत ,शुक्रिया एक बार फिर से )
पत्थर को जो भी नाम दो…
Aug 4th
कल रात घर से थोडी दूरी पर एक विस्तार में एक छोटे से मन्दिर को ले कर बवाल मच गया। गुजरात हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले उस मन्दिर को हटाने का हुक्म जारी कर दिया था। पर जिनकी आस्था उस मन्दिर से जुड़ी हैं, उनको मंज़ूर नहीं। अब दो अलग अलग गुट हो गए, एक मन्दिर हटाने के समर्थन वाले और एक मन्दिर बचाने वाले।
कल शाम जब मन्दिर तोडा जाने वाला था, लोगो ने पत्थर मारना शुरू कर दिया। मामला गंभीर होता चला गया। ३०० से ज़्यादा पुलिस वाले आ गए और उन पर भी पत्थर फेंके गए । बाद में पुलिस ने टियर गैस शेल्स छोडे और हवा में फायरिंग की तब लोग थोड़े काबू में आए। मामला देर रात तक चलता रहा। बात मन्दिर की थी वोह तो लोग जैसे भूल ही गए और आपसी जात-पात को ले कर गुटों में फिर लड़ाई हो गई…देर रात srpf के और जवान बुलाने पड़े तब जा के मामला काबू में आया।
इस मामले से मन थोड़ा व्यथित हो गया। क्या किसी पत्थर में लोगों की ‘आस्था’ दुसरें लोगो की जान से ज़्यादा कीमती हैं, या फिर ये बस दिखावा हैं? कैसे कोई एक छोटा सा मन्दिर बचाने के लिए किसी का घर तोड़ सकता है?
जब कोई जवाब नहीं मिला, कोई हल नज़र नहीं आया तो कुछ लफ्जों का सहारा ले कर एक ग़ज़ल बुन ली…
तुम पत्थर को जो भी नाम दो, फर्क नहीं आ सकता,
कोई कैसे भी तराशे उसे, फितरत नहीं मिटा सकता।
बाँट दिया भागवान को तुमने जानें कितनें रूप में,
फिर लड़ते हो उसपे, तुम्हें भागवान भी नहीं बचा सकता।
जो तुम्हें यह बेशकीमती ज़िन्दगी दे सकता हैं,
उसे छोटी छोटी रिश्वत से मनाया नहीं जा सकता।
मन्दिर या मस्जिद में जाने की हिदायत ना दो मुझे,
मेरा खुदा चंद रुपियों से ख़रीदा नहीं जा सकता।
अगर हैं वजूद-ए-खुदा, तो तुझ में ही बसा है कहीं,
हाथ जोड़ने या फैलाने से उसे पाया नहीं जा सकता।
ना जाने क्यों ?
Aug 1st
रात को देर तक जागना, तनहाई की मेहफिल सजाना, सन्नाटों से बातें करना…कभी दुनियादारी से भागने का सबक था ये…और अब आदत…इसी आदत पर कुछ दिन पहले ये ग़ज़ल कही थी…
हर रात जागती हैं मेरी तनहाई, ना जाने क्यों?
संग होती रहती हैं मेरी रुसवाई, ना जाने क्यों?
यूँ तो उजाले भर पीछा नहीं छोड़ती मगर,
कड़ी धूप में खो जाए परछाई, ना जाने क्यों?
तुमने वादा किया था, दिल को ऐतबार भी था,
लेकिन मौके पे दुनियादारी दिखाई, ना जाने क्यों?
हर तरफ़ एक सन्नाटे का माहोल है बना हुआ,
फिर भी किसी की पुकार गुनगुनाई, ना जाने क्यों?
हम ज़िन्दगी से या ज़िन्दगी हम से नाराज़ रही?
ना आज तलक ये बात समझ आई, ना जाने क्यों?
भीड़ भी अब तेरी तन्हा सी लगती हैं
Jul 24th
एक लंबे अरसे के बाद ब्लॉग्गिंग की और फिर से रुख हुआ हैं…एक नई ग़ज़ल पेश हैं…
दुनिया, भीड़ भी अब तेरी तन्हा सी लगती हैं,
हर तरफ़ बाज़ार में कहाँ इन्सान की हस्ती हैं?
आदमी इसकदर गुलाम हो चुका पैसे का,
की हर शै से ज़्यादा अब ज़िन्दगी सस्ती हैं।
दिल में ही घूँट जाए जज्बात बयाँ हुए बिना,
हड्डी और माँस के बने ये मशीनों की बस्ती हैं।
रफ्तार-ए-ज़िन्दगी ख़ुद हमने, तेज़ कर दी इतनी,
पल भर के सुकून को हर साँस तरसती हैं।
Govt., racism and terrorism…
Jun 3rd
For last few days, everybody has been watching and reading about what is going on there in
And yesterday,
No one in
Why foreign ministry is not able to create any type of international pressure on
Looking at election results and then all these situations, I feel that the people have waken up, but the government is still sleeping.
कश्मकश
Dec 22nd
दिल अपनी कशमकश ख़ुद ही ना जाने,
यूँ ही अपनें आप से हम हुए बेगाने।
ना सजती हैं हसींना बहते हैं आंसू अब,
हो क्या इलाज जब वजूद लगे ठुकराने?
दुनिया की परवाह नहीं बस तेरा है ग़म,
बिच सफर साथ छोड़ क्यों बने अंजाने ?
क्या दिल को ख्वाहिश का भी हक नहीं कोई?
या कहो शिकायत के बस मिल गए बहाने!
चेहरे पे चेहरा लगा कर जीते हैं जो,
आ गए आज हमें जीने का ढंग सिखाने!
कौन बदला है यहाँ जो बदलेगा ‘ताइर’
तरीका-ए-ज़िन्दगी सब आज़ाद हैं अपनाने।
दिन ढलते ढलते…
Dec 12th
काफ़ी समय के बाद कुछ रोमानी अंदाज़ की ग़ज़ल लिखी हैं…
दिन ढलते ढलते याद आया तो होगा,
तुम्हे मेरा ख़याल सताया तो होगा!
बेअसर ना गुजरी होगी रात तन्हाई की,
नींद ने भी ख्वाब, दिखाया तो होगा!
फिर सुबह आईने में देख ख़ुद को,
मुझे भी निगाह में पाया तो होगा!
तसव्वुर जब हर पहर सताने लगे,
बेकरार दिल को भी समजाया तो होगा!
‘ताइर’ के फन का भी जवाब नहीं कोई,
जागते हुए सपना ये सजाया तो होगा!
जाने कब होगी सुबह-ए-अमन से मुलाक़ात???
Dec 3rd
पिछले हफ़्ते मुंबई में हुए आतंकवादी हमले ने सबके दिलो को देहला दिया। उस वक्त बेंगलोर में था मैं । हमले के दुसरे दिन एक सिटी बस में ट्रेवल कर रहा था। बस में रेडियो चल रहा था। कन्नड़ में कुछ अन्नौसमेंट हुआ और उसके बाद गाना आया…’कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो’… और एकदम से सन्नाटे का माहोल छा गया। गाने के लफ्जों का असर मन पे हो रहा था… न्यूज़ में देखे सीन याद आने लगे और आँखे झिलमिल हो उठी… तभी मेरे पीछे वाली सीट से थोडी सिसकने की आवाज़ आई तो थोड़ा पीछे मुद कर देखा मैंने। करीबन मेरी ही उमर का एक लड़का आंसू पोंछ रहा था। फिर मुह फेर कर दूसरी और देखा तो सामने एक कपल भी अपने आंसू रोक नही पा रहा था। दोनों की आँख में आंसू। और फिर पीछे पलट कर देखा तो और भी काफ़ी ऐसे लोग थे जो देश के इस हाल पर आंसू बहा रहे थे। कंडक्टर की आँखे भी भर आई थी। शायद बेबसी थी… या फिर गुस्से का बहाव…
इस से पहले ऐसा कभी ना सुना था ना कभी महसूस किया था। एक अरसे के बाद दिल बोल उठा…हाँ मैं भी हिन्दुस्तानी हूँ…
ना अल्फाज़ है कोई, न कोई ख़यालात,
लगे ये दिल खाली, बुझे हुए से जज़्बात।
हर तरफ़ आतंक का माहोल जो बना हुआ,
कैसे मैं मान लूँ, खुदा चलाए कायनात?
चंद धमाकों की मोहताज हो ज़िन्दगी जैसे,
हर लम्हा चल रहे यूँ दहशत के हालात।
चैन-ओ-सुकूं इन्सान अब पाए भी तो कहाँ से?
जब दिल में कुछ और, ज़ुबां पे दूजी बात।
सहमे हुए से दिल, बेनूर से रुखसार यहाँ,
जाने कब होगी सुबह-ए-अमन से मुलाक़ात?
चंद लम्हें
Nov 13th
चंद लम्हें नशे के मंज़र साफ़ कर गए,
रिश्तो के आईने को बेनकाब कर गए।
भीगी सी आँखों से झिलमिल यूँ दूर हुई,
आंसू-ओ-ख्वाब पुरा हिसाब कर गए।
होश में हर बयाँ जो होता था अनसुना,
खुमार में कही वो बात, तो तमाम कर गए।
नहीं होता ग़म किसी के छोड़ने का दिल को,
शुक्र हैं बहोत जल्द वो आजाद कर गए।
खुशनसीबी ‘ताइर’ की ये भी देखो यारों,
आप ही उसे अब तो ख़ुद के साथ कर गए।
कैसे कैसे हसीन ख्वाब..
Oct 5th
कैसे कैसे हसीन ख्वाब दिखा जाते हो,
खूब है अंदाज़, दिल तोड़ के बहलाते हो।
मांग कर मुस्कान हमसे हाल-ए-बीमार में,
नाचारी का एहसास क्यों बार बार दिलाते हो?
मकाम-ए-ज़िन्दगी यहाँ थमा हुआ है कब से,
और तुम हो की एक दफ़ा लौट कर ना आते हो।
सहारा ना बने लेकिन मशवरा ज़रूर दिया,
दुनिया से सिखा हूनर हम पे आजमाते हो।
तसव्वुर में बसे हो और हकीकत से कहीं दूर,
‘ताइर‘ से रिश्ता क्यों न तोड़ते ना निभाते हो???